सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: निजी अंग छूना दुष्कर्म नहीं, 20 साल की सजा घटकर 7 साल ⚖️
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि सिर्फ नाबालिग लड़की के निजी अंगों को छूने के आरोप पर किसी व्यक्ति को दुष्कर्म या “पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट” का दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
मामला क्या था? 📝
- आरोपी लक्ष्मण जांगड़े को ट्रायल कोर्ट ने 20 साल का कठोर कारावास और ₹50,000 जुर्माना सुनाया था।
- छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भी इस फैसले को बरकरार रखा।
- आरोपी पर आरोप था कि उसने 12 साल की किशोरी के निजी अंगों को छुआ और अपने निजी अंगों को भी छुआ।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी 👨⚖️
जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा:
- इस मामले में आईपीसी की धारा 376 एबी (दुष्कर्म) और पॉक्सो अधिनियम की धारा 6 (पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट) लागू नहीं होती।
- रिकॉर्ड में मौजूद सबूत, मेडिकल रिपोर्ट और पीड़िता के बयानों में पेनेट्रेशन का कोई प्रमाण नहीं है।
- यह अपराध केवल आईपीसी की धारा 354 (महिला की लज्जा भंग करना) और पॉक्सो अधिनियम की धारा 7 (सेक्शुअल असॉल्ट/निजी अंग छूना) के दायरे में आता है।
सरकार की दलीलें बनाम कोर्ट का रुख 🏛️
- छत्तीसगढ़ सरकार के वकील ने कहा कि आरोपी के प्रति किसी तरह की सहानुभूति की ज़रूरत नहीं क्योंकि उसने 12 साल की बच्ची के साथ अपराध किया।
- लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि कानून के तहत सज़ा सबूतों के आधार पर तय होती है, न कि भावनाओं के आधार पर।
सजा में बदलाव ⚡
- पहले: 20 साल का कठोर कारावास
- अब: 7 साल की सजा (आईपीसी धारा 354 और पॉक्सो धारा 7 के तहत)
कानूनी संदेश 📚
यह फैसला बताता है कि:
- पेनेट्रेशन के बिना दुष्कर्म साबित नहीं किया जा सकता।
- नाबालिग के साथ निजी अंग छूने की घटना गंभीर अपराध है, लेकिन उसकी श्रेणी अलग है।
- अदालतें केवल मजबूत सबूत और कानूनी परिभाषाओं के आधार पर ही अपराध की धारा तय करती हैं।
✍️ निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला एक बार फिर यह स्पष्ट करता है कि कानून की नज़र में सबूत और परिभाषाएँ सर्वोपरि हैं। यह घटना गंभीर है और अपराधी को सज़ा भी मिली है, लेकिन “दुष्कर्म” और “पेनेट्रेटिव असॉल्ट” जैसी धाराएँ सिर्फ तभी लागू होंगी जब मेडिकल और गवाही से स्पष्ट प्रमाण मिले।
