राजकीय विद्यालयों में शिक्षकों की भारी कमी: साइंस के टीचर पढ़ा रहे,गणित बच्चों की पढ़ाई पर संकट 📚


बहराइच के राजकीय विद्यालयों में शिक्षकों की भारी कमी: बच्चों की पढ़ाई पर संकट 📚

बहराइच। जिले के 59 राजकीय विद्यालय इस समय शिक्षकों और प्रधानाचार्यों की भारी कमी से जूझ रहे हैं। हालात यह हैं कि कहीं हिंदी के शिक्षक गणित पढ़ाने को मजबूर हैं, तो कहीं गणित के शिक्षक विज्ञान पढ़ा रहे हैं। यह स्थिति न सिर्फ बच्चों की पढ़ाई की गुणवत्ता पर असर डाल रही है, बल्कि शिक्षकों पर भी दोहरी जिम्मेदारी का बोझ डाल रही है।

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प्रधानाचार्यों के पद खाली 🏫

  • जिले के 7 राजकीय इंटर कॉलेजों में केवल 3 प्रधानाचार्य तैनात हैं, शेष 4 कॉलेज प्रभारी प्रधानाचार्यों के सहारे चल रहे हैं।
  • 8 राजकीय बालिका इंटर कॉलेजों में स्थिति और भी खराब है – यहाँ केवल 1 प्रधानाचार्या तैनात हैं, जबकि 7 पद रिक्त हैं।
  • 40 राजकीय हाईस्कूलों में सिर्फ 14 प्रधानाध्यापक हैं, शेष 26 स्कूल प्रभारी प्रधानाध्यापकों के भरोसे संचालित हो रहे हैं।

शिक्षकों की भयावह कमी 👩‍🏫👨‍🏫

  • राजकीय इंटर कॉलेजों में 148 प्रवक्ता पद स्वीकृत हैं, लेकिन केवल 83 पद भरे हुए हैं। यानी 65 पद रिक्त हैं।
  • सहायक अध्यापकों की हालत और खराब है – 434 पद स्वीकृत, पर सिर्फ 224 पदों पर नियुक्ति, जबकि 210 पद खाली।

यही कारण है कि कहीं हिंदी के शिक्षक गणित पढ़ा रहे हैं, तो कहीं गणित के शिक्षक विज्ञान। इसका सीधा असर बच्चों की शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ रहा है।

प्रशासन की सफाई 📝

जिला विद्यालय निरीक्षक (DIOS) सर्वदानंद का कहना है कि:

  • शासन को रिक्त पदों की जानकारी भेज दी गई है।
  • जल्द ही नियुक्तियां कराकर स्थिति सुधारी जाएगी।
  • फिलहाल यह दावा किया गया है कि कहीं भी पठन-पाठन प्रभावित नहीं होने दिया जा रहा है।

सरकारी लापरवाही या बच्चों का भविष्य? 🤔

शिक्षक संगठनों का कहना है कि यह सरकार की बड़ी लापरवाही है।

  • वर्षों से पद खाली पड़े हैं, पर भर्तियां नहीं हो रही।
  • सीमित संख्या में मौजूद शिक्षकों पर दोहरी-तिहरी जिम्मेदारी डालकर उनसे गुणवत्ता की उम्मीद करना गलत है।
  • सबसे ज्यादा नुकसान गरीब और मध्यमवर्गीय बच्चों को हो रहा है जो निजी स्कूलों में नहीं पढ़ सकते।

निष्कर्ष ✍️

बहराइच के सरकारी स्कूलों की यह तस्वीर पूरे प्रदेश की हालत बयान करती है। खाली पदों पर त्वरित नियुक्ति ही एकमात्र समाधान है। जब तक शिक्षक और प्रधानाचार्य पूरी संख्या में स्कूलों में नहीं होंगे, तब तक “गुणवत्तापूर्ण शिक्षा” का सपना अधूरा ही रहेगा।


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