⚖️ इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: मां के नौकरी में होने के बावजूद मृतक आश्रित कोटे से नियुक्त बेटे पर रोक
इलाहाबाद हाईकोर्ट की दो जजों की खंडपीठ ने उस मामले में बड़ा आदेश दिया है जिसमें एक बेटे ने मृतक आश्रित कोटे से नौकरी पाई, जबकि उसकी मां पहले से ही सरकारी सेवा में कार्यरत थीं।
न्यायमूर्ति एम.के. गुप्ता और न्यायमूर्ति अरुण कुमार की खंडपीठ ने एकल पीठ के आदेश पर रोक लगाते हुए सरकार की विशेष अपील को स्वीकार किया है।
📌 मामला क्या है?
- बस्ती के पंचायती राज विभाग में राहुल के पिता नौकरी कर रहे थे।
- सेवा के दौरान उनकी मृत्यु हो गई।
- इसके बाद राहुल को मृतक आश्रित कोटे से नौकरी मिल गई।
- लेकिन विभाग ने पाया कि राहुल की मां पहले से सहायक अध्यापिका थीं।
- इस तथ्य को छिपाने के आधार पर 28 अगस्त 2021 को राहुल की नियुक्ति समाप्त कर दी गई।
🏛️ हाईकोर्ट में चुनौती
- राहुल ने इस आदेश को हाईकोर्ट की एकल पीठ में चुनौती दी।
- एकल पीठ ने 18 अप्रैल 2025 को राहुल के पक्ष में फैसला सुनाया।
- लेकिन अब पंचायती राज विभाग ने इस आदेश के खिलाफ विशेष अपील दायर की।
- खंडपीठ ने एकल पीठ के आदेश पर रोक लगा दी है।
⚖️ सरकार का पक्ष
सरकार ने अपील में कहा:
- मृतक आश्रित नियुक्ति की शर्त है कि यदि पति/पत्नी पहले से सरकारी नौकरी में हों तो अन्य आश्रित पात्र नहीं होगा।
- आवेदन करते समय परिवार की वित्तीय स्थिति और नौकरी की जानकारी छिपाई गई।
- इसलिए यह नियुक्ति नियमों के खिलाफ है।
🙋♂️ याची (राहुल) का पक्ष
राहुल का कहना था कि:
- आवेदन फॉर्म में मां की नौकरी का उल्लेख करने का कोई कॉलम ही नहीं था।
- उसे नौकरी करते हुए 10 साल से अधिक समय हो चुका है।
- ऐसे में सेवा से हटाना अनुचित है।
✨ सरकारी कलम की राय
यह मामला दो अहम पहलुओं को सामने लाता है:
- नियम बनाम संवेदना – मृतक आश्रित कोटे का मकसद परिवार को आर्थिक संकट से निकालना है। अगर परिवार पहले से आर्थिक रूप से सुरक्षित है, तो नियमों का पालन होना चाहिए।
- प्रक्रिया की पारदर्शिता – आवेदन फॉर्म और उसकी शर्तें स्पष्ट न होना भी विवाद की जड़ है।
👉 इस तरह के मामलों में सरकार को चाहिए कि नियमों को पारदर्शी बनाए और आवेदन प्रक्रिया में ऐसी स्थिति का स्पष्ट उल्लेख करे।
