इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: लंबे प्रेम संबंध के बाद शारीरिक रिश्ता दुष्कर्म नहीं 🚨
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि यदि कोई महिला लंबे समय तक प्रेम संबंध में रहते हुए सहमति से शारीरिक संबंध बनाती है, तो उसे दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकलपीठ ने यह टिप्पणी उस समय की, जब महोबा जिले की एक महिला ने अपने सहकर्मी लेखपाल पर शादी का झांसा देकर दुष्कर्म का आरोप लगाया था।
मामला क्या है?
- पीड़िता का आरोप था कि वर्ष 2019 में आरोपी सहकर्मी ने जन्मदिन की पार्टी में नशीला पदार्थ खिलाकर दुष्कर्म किया और वीडियो बनाकर ब्लैकमेल किया।
- होश में आने के बाद उसने शादी का वादा किया, लेकिन चार साल बाद जातिगत टिप्पणी कर शादी से इंकार कर दिया।
- पुलिस व विशेष एससी/एसटी अदालत में शिकायत खारिज होने के बाद महिला ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
आरोपी पक्ष की दलील
आरोपी के अधिवक्ता ने कहा कि महिला ने स्वयं थाने और एसपी को लिखकर कार्रवाई से इनकार किया था। लेकिन जब आरोपी ने दो लाख रुपये उधार की रकम वापस मांगी, तब महिला ने परिवाद दाखिल कर दिया।
हाईकोर्ट का फैसला
कोर्ट ने कहा 👉
- यदि महिला शुरू से जानती है कि सामाजिक कारणों से शादी संभव नहीं है और इसके बावजूद वर्षों तक सहमति से संबंध बनाती रही, तो इसे दुष्कर्म नहीं माना जाएगा।
- इसलिए पीड़िता की याचिका खारिज कर दी गई।
बेसिक शिक्षा विभाग पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख़्ती ⚖️
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बेसिक शिक्षा विभाग के अधिकारियों की लापरवाही पर कड़ा रुख अपनाया है।
मामला एक कर्मचारी से जुड़ा है, जिसके पक्ष में कोर्ट ने पहले ही आदेश जारी किए थे। लेकिन, विभागीय अधिकारियों ने उनका पालन नहीं किया।
कोर्ट की नाराजगी
न्यायालय ने कहा कि—
- बेसिक शिक्षा सचिव, लखनऊ और सहायक शिक्षा निदेशक (बेसिक) आज़मगढ़ क्षेत्र को निर्देश दिया जाता है कि 13 जुलाई 2017 के आदेश का पालन करें।
- यदि आदेश का पालन नहीं होता है, तो दोनों अधिकारी 22 सितंबर 2025 को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में उपस्थित होकर जवाब दें।
निष्कर्ष ✍️
इलाहाबाद हाईकोर्ट के ये दोनों फैसले दो अलग-अलग क्षेत्रों में न्यायपालिका की सख़्ती को दर्शाते हैं।
- एक ओर अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया कि लंबे समय तक सहमति से चले रिश्ते को दुष्कर्म नहीं कहा जा सकता, ताकि कानून का दुरुपयोग न हो।
- वहीं दूसरी ओर अदालत ने शिक्षा विभाग के अधिकारियों को चेतावनी दी है कि कोर्ट के आदेशों की अवहेलना बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
👉 ये दोनों घटनाएं हमें यह याद दिलाती हैं कि कानून का उद्देश्य सिर्फ सज़ा देना नहीं, बल्कि न्याय की सच्ची भावना को बनाए रखना भी है।
