⚖️ सुप्रीम कोर्ट ने नेपाल का हवाला देकर भारतीय संविधान की सराहना की
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय संविधान की स्थिरता और मजबूती की सराहना करते हुए पड़ोसी देशों की स्थिति का उल्लेख किया। मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने कहा कि “हमें अपने संविधान पर गर्व है… देखिए पड़ोसी देशों में क्या हो रहा है।”
🏛️ संविधान पीठ की टिप्पणी
- संविधान पीठ में शामिल जस्टिस बीआर गवई, सूर्यकांत, विक्रम नाथ, पीएस नरसिम्हा और अतुल एस चंदुरकर ने राष्ट्रपति संदर्भ पर नौवें दिन की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की।
- जस्टिस गवई ने नेपाल में हो रहे हिंसक विरोध-प्रदर्शनों का जिक्र करते हुए कहा कि भारत का संविधान स्थिरता और लोकतंत्र का प्रतीक है।
- जस्टिस विक्रम नाथ ने जोड़ा कि “बांग्लादेश में भी हालात देखिए।”
- उन्होंने साफ कहा कि चाहे किसी भी दौर में 50% विधेयक रोके गए हों या 90%, भारत 75 वर्षों से संविधान और लोकतंत्र के साथ स्थिरता से चल रहा है।
📌 केंद्र की दलीलें
- केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि 1970 से 2025 तक देशभर में 17,000 विधेयकों में से सिर्फ 20 विधेयक ही रोके गए।
- इस पर जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा कि यह आंकड़े चाहे जो भी हों, 2014 से पहले क्या हुआ और बाद में क्या हो रहा है, यह कोर्ट के लिए प्रासंगिक नहीं।
📜 मामला क्या है?
- सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत भेजे गए संदर्भ पर सुनवाई कर रही है।
- राष्ट्रपति ने उस फैसले पर स्पष्टीकरण मांगा है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति और राज्यपालों के लिए विधायिका से पारित विधेयकों पर कार्रवाई करने की समयसीमा तय की थी।
- इस मामले में कोर्ट यह देख रही है कि राष्ट्रपति और राज्यपालों की शक्तियों और विधायिका के अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
✍️ सरकारी कलम की राय
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी न केवल भारत के संविधान की स्थिरता और मजबूती को रेखांकित करती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि हमारे पड़ोसी देशों में राजनीतिक अस्थिरता और संवैधानिक संकट कैसे उभर रहे हैं। 75 वर्षों की लोकतांत्रिक यात्रा भारत की सबसे बड़ी ताकत है और इसे सुरक्षित रखना हर नागरिक और संस्था की जिम्मेदारी है।
