बेसिक शिक्षा परिषद के प्राइवेट स्कूलों के बच्चों के साथ नाइंसाफी: मुफ्त किताबें सरकारी स्कूलों तक सीमित, प्राइवेट स्कूलों के लिए ‘बाजार का खेल’

बेसिक शिक्षा परिषद के प्राइवेट स्कूलों के बच्चों के साथ नाइंसाफी: मुफ्त किताबें सरकारी स्कूलों तक सीमित, प्राइवेट स्कूलों के लिए ‘बाजार का खेल’

उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा परिषद के 1.32 लाख सरकारी स्कूलों के बच्चों को जहां हर साल मुफ्त किताबें मुहैया कराई जाती हैं, वहीं परिषद से मान्यता प्राप्त 74,471 प्राइवेट स्कूलों के लाखों बच्चों को इस सुविधा से वंचित रखा गया है। इन छात्रों को मनमाने दामों पर निजी प्रकाशकों से किताबें खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।

सरकारी और प्राइवेट स्कूलों में किताबों को लेकर दोहरा रवैया

  • सरकारी स्कूलों में: कक्षा 1–3 तक एनसीईआरटी पाठ्यक्रम लागू, किताबें विभाग द्वारा अधिकृत प्रकाशकों से छपवाई जाती हैं और मुफ्त दी जाती हैं।
  • प्राइवेट स्कूलों में: सरकारी किताबें उपलब्ध नहीं कराई गईं, जबकि ये भी बेसिक शिक्षा परिषद से मान्यता प्राप्त हैं।

बाजार में क्यों नहीं उपलब्ध सरकारी किताबें?

नियम के अनुसार, जो प्रकाशक सरकारी स्कूलों के लिए किताबें छापते हैं, वही बाजार में भी वही किताबें बेचेंगे। इसके लिए विभाग को सरकारी प्रिंटिंग प्रेस से कवर पेज छपवाकर प्रकाशकों को देना होता है। लेकिन विभाग की लेटलतीफी और सुस्ती के चलते यह प्रक्रिया समय पर पूरी नहीं हो पाई।

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मुनाफाखोरी का खेल

सूत्रों के मुताबिक, निजी प्रकाशक मनमाने दामों पर किताबें बेचकर बड़े पैमाने पर मुनाफा कमा रहे हैं। आरोप है कि ये प्रकाशक कुछ स्कूलों को कमीशन भी देते हैं।

  • कुछ प्रकाशकों की किताबों में पन्नों की संख्या और पाठ्य सामग्री कम होती है।
  • कुछ में अधिक, लेकिन दाम मनमर्जी के तय होते हैं।

शिक्षा विशेषज्ञों और प्रबंधकों की नाराजगी

लखनऊ के स्कूल प्रबंधक रामानंद सैनी का कहना है, “जब बोर्ड एक है तो किताबें भी समान होनी चाहिए।”
विधान परिषद में मुद्दा उठाने वाले डॉ. मान सिंह ने कहा, “सरकार ने बच्चों को बाजार के भरोसे छोड़ दिया है, शिक्षा की कोई चिंता ही नहीं है।”

विभाग का तर्क

पाठ्य पुस्तक अधिकारी माधव जी तिवारी के मुताबिक, “प्रक्रिया चल रही है। सरकारी किताबों के कवर पेज जल्द ही प्रकाशकों को दिए जाएंगे।”


निष्कर्ष:

यह पूरा मामला दर्शाता है कि शिक्षा व्यवस्था में नीतियों का दोहरा व्यवहार और निजी प्रकाशकों की मुनाफाखोरी बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ कर रही है। जब बोर्ड और पाठ्यक्रम एक है, तो सभी बच्चों के लिए किताबें भी समान, सुलभ और समय पर उपलब्ध कराई जानी चाहिए।


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