माँ का साहस, बेटी की गुहार: पुल नहीं तो पढ़ाई कैसे?
✍️ सरकारी कलम स्पेशल रिपोर्ट | चमोली, उत्तराखंड
जब नदियाँ उफनती हैं, तब अक्सर रास्ते रुक जाते हैं। लेकिन जब एक माँ का संकल्प उफनता है, तो वह किसी भी नाले, नदी या पहाड़ को पार करने का हौसला रखती है।
उत्तराखंड के चमोली जिले से ऐसी ही एक मार्मिक और प्रेरणादायक कहानी सामने आई है — आरती देवी और उनकी बेटी तनीषा की।
🌊 ऊफनते नाले पर माँ का समर्पण
नारायणबगड़ ब्लॉक के कोट मदनपुर गांव की रहने वाली आरती देवी हर दिन एक जंग लड़ती हैं — बरसात में उफनते ‘चमतोली नाले’ को पार करने की।
लेकिन ये जंग खुद के लिए नहीं, बल्कि अपनी बेटी तनीषा और बेटे प्रिंस की शिक्षा के अधिकार के लिए है।
📷 वायरल हुई तस्वीर में देखा गया कि कैसे आरती देवी पानी के तेज बहाव में पैर जमाकर बेटी को पीठ पर टिका कर स्कूल पहुंचा रही हैं। ये तस्वीर सिर्फ एक दृश्य नहीं, बल्कि मातृत्व का अद्भुत प्रमाण है।
🎓 तनीषा की अपील: ‘सरकार जी, एक पुल बना दो…’
राजकीय इंटर कॉलेज, कोठली में कक्षा 8 की छात्रा तनीषा रावत ने एक वीडियो संदेश के माध्यम से मुख्यमंत्री और प्रशासन से एक सादा-सी अपील की है —
“मुझे पढ़ना है, लेकिन मैं अपनी माँ की जान हर दिन खतरे में नहीं डालना चाहती। हमें स्कूल जाने के लिए एक पुल चाहिए।“
उसका यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो चुका है और हजारों लोगों की संवेदनाएं जुड़ चुकी हैं।
⚠️ क्या है समस्या?
- चमतोली नाला बरसात में इतना उफन जाता है कि बच्चों, महिलाओं या बुजुर्गों के लिए इसे पार करना जानलेवा बन जाता है।
- कई बच्चों ने स्कूल जाना बंद कर दिया है।
- प्रशासन द्वारा अब तक पुल निर्माण की कोई ठोस कार्यवाही नहीं हुई।
🗣️ आरती देवी का दर्द
“जब नाला ज्यादा उफान पर होता है, तो बच्चों की छुट्टी करनी पड़ती है। कभी लगता है कि कहीं एक दिन कोई हादसा न हो जाए।”
🚨 सरकारी कलम की अपील
📣 सरकार, प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से सरकारी कलम की ओर से यह अपील है —
जब एक माँ हर दिन अपनी जान जोखिम में डाल सकती है, तो क्या शासन-प्रशासन एक सुरक्षित पुल नहीं बना सकता?
📝 निष्कर्ष
माँ का समर्पण और बेटी की गुहार हमें एक बार फिर याद दिलाते हैं कि शिक्षा का अधिकार सिर्फ कागजों पर नहीं, ज़मीन पर भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
तनीषा को पढ़ने का हक है — और वह भी सुरक्षित रास्ते से।
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✒️ रिपोर्ट: सरकारी कलम डेस्क
