उत्तर प्रदेश में परिषदीय विद्यालयों के विलय (स्कूल मर्जर) के खिलाफ एक नई जनहित याचिका (PIL) दाखिल की गई है, जो अब न्यायिक रूप से लखनऊ पीठ की डिवीजन बेंच के सामने पहुंच गई है। याचिका में शिक्षा के अधिकार अधिनियम (RTE Act) के आलोक में बच्चों की बुनियादी जरूरतें और सुविधाओं की ओर अदालत का ध्यान आकर्षित किया गया है।
⚖️ जनहित याचिका में मुख्य बिंदु:
📝 याचिकाकर्ता:
- अधिवक्ता ज्योति राजपूत ने दाखिल की PIL
- मांग:
- 16 जून 2025 के स्कूल मर्जर के आदेश को रद्द किया जाए
- ग्रामीण व दूरदराज के बच्चों के लिए स्कूल तक पहुंचने हेतु निःशुल्क परिवहन व्यवस्था की जाए
- आरटीई एक्ट 2009 के तहत दिशानिर्देश तय किए जाएं कि अगर स्कूल 1 किमी से अधिक दूर हो तो सरकार क्या सुविधाएं देगी
🧑⚖️ कोर्ट की वर्तमान स्थिति:
- यह याचिका 7 जुलाई को खारिज की गई एकल पीठ के फैसले के बाद दाखिल हुई है
- अब यह डबल बेंच (खंडपीठ) — न्यायमूर्ति ए.आर. मसूदी और न्यायमूर्ति श्रीप्रकाश सिंह — के समक्ष 11 जुलाई या इसके आसपास सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है
⚠️ पिछले फैसले का असर:
- हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने कहा था कि:
- मर्जर स्कूल बंद करना नहीं है, बल्कि प्रशासनिक संसाधनों का समेकन है
- NEP 2020 के अनुसार यह कदम गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए उचित है
- याचिकाकर्ता यह सिद्ध नहीं कर सके कि बच्चों के अधिकारों का प्रत्यक्ष उल्लंघन हुआ है
🔍 नई याचिका में क्या नया है?
- यह याचिका इस बात पर ज़ोर देती है कि —
- मूलभूत शिक्षा तक पहुंच केवल स्कूल खोलने से नहीं बल्कि सुलभ पहुंच (accessible access) से भी तय होती है
- स्कूल 1 किमी से अधिक दूरी पर हैं तो छोटे बच्चों के लिए सुरक्षित और नियमित परिवहन सुविधा देना राज्य की ज़िम्मेदारी है
- RTE Act की धारा 3, 4, 6 और Rule 4(2) (UP RTE Rules, 2011) को आधार बनाया गया है
📌 प्रभाव और संभावनाएं:
- यदि डबल बेंच ने इसे गंभीर माना, तो:
- राज्य सरकार को परिवहन सुविधा का प्लान प्रस्तुत करना पड़ सकता है
- या फिर मर्ज किए गए स्कूलों के निर्णय को आंशिक रूप से पलटा भी जा सकता है
- वहीं सरकार की तरफ से मुख्य स्थायी अधिवक्ता शैलेंद्र कुमार सिंह ने साफ किया कि अदालत पहले ही मर्जर को वैध ठहरा चुकी है
🧭 दूरगामी निष्कर्ष:
- यह याचिका एक बड़े सवाल को जन्म देती है:
“क्या स्कूल तक पहुंचने के लिए केवल भवन काफी है, या रास्ता भी जरूरी है?” - यदि न्यायालय बच्चों के “स्कूल तक पहुंचने के अधिकार” को अलग से परिभाषित करता है, तो इससे RTE की व्याख्या और शिक्षा नीतियों में बड़ा बदलाव आ सकता है।
