बीएड को प्राथमिकता देना असंवैधानिक? कंप्यूटर शिक्षक भर्ती पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, सरकार से मांगा जवाब ⚖️🖥️
प्रयागराज — इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कंप्यूटर विषय के सहायक अध्यापक की नियुक्ति में बीएड डिग्रीधारकों को अधिमानी अर्हता (प्राथमिकता योग्यता) देने पर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी करते हुए 6 हफ्तों के भीतर जवाब मांगा है।
यह आदेश न्यायमूर्ति अश्विनी कुमार मिश्र और न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरि की खंडपीठ ने अमरोहा निवासी प्रवीण सिंह की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। मामले की अगली सुनवाई 21 जुलाई को निर्धारित की गई है।
याची की दलील: नियम NCTE के खिलाफ
प्रवीण सिंह का कहना है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने 1983 की सेवा नियमावली में संशोधन कर कंप्यूटर विषय के लिए केवल बीएड डिग्रीधारकों को वरीयता दे दी है, जो कि राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (NCTE) द्वारा निर्धारित मानकों के खिलाफ है।
NCTE ने 2014 में कंप्यूटर शिक्षा के लिए बीएड सहित कई अन्य डिग्री/डिप्लोमा को मान्यता दी थी। ऐसे में केवल बीएड धारकों को वरीयता देना संविधान के अनुच्छेदों और शिक्षा नीति के विपरीत माना जा सकता है।
संविधान, समानता और शिक्षा नीति पर बड़ा सवाल
याचिका में यह भी कहा गया है कि बीएड को अधिमानी अर्हता बनाना अन्य योग्य उम्मीदवारों के अधिकारों का हनन है और इससे योग्यता के आधार पर चयन प्रक्रिया प्रभावित होती है।
यह मामला अब शिक्षा नीति बनाम सेवा नियमावली की लड़ाई बनता दिख रहा है। यदि कोर्ट बीएड को अधिमानी अर्हता देने के फैसले को खारिज करता है, तो प्रदेश भर में कंप्यूटर शिक्षक भर्ती की प्रक्रिया पर बड़ा असर पड़ सकता है।
सरकार की नीति पर कोर्ट का हस्तक्षेप
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह मामला केवल चयन प्रक्रिया का नहीं, बल्कि शिक्षा में समानता और संविधान सम्मत प्रक्रिया का प्रश्न है। महाधिवक्ता को नोटिस जारी कर राज्य सरकार से जवाब दाखिल करने को कहा गया है।
निष्कर्ष: अगली सुनवाई पर टिकी हैं कई उम्मीदें
21 जुलाई को होने वाली अगली सुनवाई में यह तय होगा कि क्या राज्य सरकार NCTE के मानकों के अनुरूप संशोधन करेगी या अपनी सेवा नियमावली का बचाव करेगी। फिलहाल इस केस ने कंप्यूटर विषय के शिक्षक पद की भर्ती प्रक्रिया को कानूनी बहस के घेरे में ला खड़ा किया है।
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