कोर्ट ने कहा: “जज का आचरण ऐसा हो कि न्यायिक प्रणाली में आम जनता का भरोसा बना रहे।”

इलाहाबाद हाईकोर्ट का सख्त रुख: प्रतिकूल सेवा अभिलेखों के आधार पर विशेष न्यायाधीश की अनिवार्य सेवानिवृत्ति बरकरार


प्रमुख बिंदु:

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  • कोर्ट ने कहा: “जज का आचरण ऐसा हो कि न्यायिक प्रणाली में आम जनता का भरोसा बना रहे।”
  • न्यायमूर्ति अश्विनी कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति डोनाडी रमेश की खंडपीठ ने याचिका खारिज की।
  • याची रमेश कुमार यादव 2001 में सिविल जज (जूनियर डिवीजन) बने थे।
  • बाद में सीनियर डिवीजन और फिर विशेष न्यायाधीश (SC/ST कोर्ट, कौशाम्बी) के पद पर तैनात हुए।
  • सेवानिवृत्ति फरवरी 2026 में निर्धारित थी, लेकिन 2021 में अनिवार्य सेवानिवृत्ति दे दी गई।
  • 2008-09 में प्रशासनिक जज द्वारा दी गई प्रतिकूल प्रविष्टि के आधार पर यह निर्णय लिया गया।
  • याचिका में स्क्रीनिंग समिति पर कोई पक्षपात या दुर्भावना का आरोप नहीं लगाया गया।

कोर्ट की टिप्पणी:

“हमें यह मानने में कोई हिचक नहीं कि सेवा अभिलेखों की प्रतिकूल सामग्री यह साबित करती है कि याची को न्यायिक सेवा में बने रहने का कोई अधिकार नहीं है।”


निष्कर्ष:
यह निर्णय साफ संदेश देता है कि न्यायिक पदों पर आसीन अधिकारियों से उच्च नैतिकता और अनुशासन अपेक्षित है। प्रतिकूल प्रविष्टियों को समय रहते चुनौती न देना भी गंभीर परिणाम ला सकता है।

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