स्कूल चलो अभियान पड़ा फीका, कई सरकारी स्कूलों में अब तक नहीं हुए पांच भी दाखिले


स्कूल चलो अभियान में लापरवाही उजागर, नामांकन न होने पर बीएसए ने जताई सख्त नाराजगी

लखनऊ।
उत्तर प्रदेश में परिषदीय स्कूलों में बच्चों की संख्या बढ़ाने के लिए चलाया जा रहा स्कूल चलो अभियान इस बार खास असर नहीं दिखा पाया है। अप्रैल माह की रिपोर्ट के अनुसार, राजधानी के कई सरकारी स्कूल ऐसे हैं जहां अब तक पांच बच्चों के भी दाखिले नहीं हुए हैं, जबकि कुछ स्कूलों में एक भी नामांकन नहीं हुआ


नगर और ग्रामीण—दोनों क्षेत्रों के स्कूलों में खराब स्थिति

यह स्थिति केवल ग्रामीण क्षेत्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि शहरी क्षेत्र के भी कई स्कूलों में नामांकन बेहद कम है।
बीआरसी कार्यालय की ओर से भेजी गई गूगल शीट रिपोर्ट में यह सामने आया है कि स्कूलों में बच्चों की संख्या बढ़ाने को लेकर प्रयास न के बराबर हुए हैं।

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बीएसए राम प्रवेश ने रिपोर्ट पर नाराजगी जाहिर करते हुए कहा, “यदि समय पर स्कूल चलो अभियान को गंभीरता से लिया गया होता, तो आज यह स्थिति नहीं होती।”


कम दाखिले वाले स्कूलों के शिक्षकों पर होगी कार्रवाई

बीएसए ने सभी खंड शिक्षा अधिकारियों (BEOs) को निर्देशित किया है कि जिन स्कूलों में नामांकन पांच से कम या शून्य है, वहां के शिक्षकों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
इसके साथ ही नामांकन बढ़ाने के लिए तत्काल प्रभाव से अभियान को और प्रभावशाली बनाने के निर्देश भी दिए गए हैं।


शिक्षकों ने नियमों पर उठाए सवाल

शिक्षकों का कहना है कि वर्तमान में एक प्रमुख अड़चन यह है कि दाखिले के लिए छह वर्ष की आयु पूरी होना अनिवार्य है।

“कई बच्चे ऐसे हैं जिनकी उम्र जुलाई के बाद पूरी होगी, लेकिन मौजूदा नियमों के तहत उनका नामांकन अभी नहीं किया जा सकता,” – एक शिक्षक ने बताया।

इस नियम के कारण नामांकन की गति धीमी हो रही है।


राजधानी में 1618 प्राइमरी स्कूल, लेकिन अभियान कमजोर

राजधानी लखनऊ में कुल 1618 परिषदीय प्राइमरी स्कूल संचालित हो रहे हैं।
एक अप्रैल से नए शैक्षिक सत्र की शुरुआत के साथ ही “स्कूल चलो अभियान” को तेजी से लागू किया गया, लेकिन नीतिगत सख्ती और अभियान में समर्पण की कमी के कारण अपेक्षित परिणाम नहीं मिल सके हैं।


निष्कर्ष: जरूरत है नीति और प्रयासों के सामंजस्य की

“स्कूल चलो अभियान” का उद्देश्य बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ना है, लेकिन यदि नियमों में लचीलापन और मैदानी स्तर पर ईमानदार प्रयास नहीं होंगे, तो यह लक्ष्य अधूरा ही रह जाएगा।
अब देखने वाली बात होगी कि नामांकन शून्य वाले स्कूलों पर कैसी कार्रवाई होती है और आगे क्या बदलाव लाए जाते हैं।


आपके क्षेत्र के स्कूलों में बच्चों का नामांकन कैसा रहा? नीचे कमेंट कर अपनी राय जरूर दें।

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