लिव-इन रिलेशन में सहमति से बने संबंध, दुष्कर्म का मामला नहीं: सुप्रीम कोर्ट

लिव-इन रिलेशन में सहमति से बने संबंध, दुष्कर्म का मामला नहीं: सुप्रीम कोर्ट


लिव-इन में लंबे समय तक रहने वाले जोड़ों के संबंधों को मानी जाएगी वैध सहमति: सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली।
सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा है कि यदि कोई प्रेमी जोड़ा लंबे समय तक लिव-इन रिलेशन में रहता है, तो उनके बीच बने शारीरिक संबंधों को वैध सहमति पर आधारित माना जाएगा। अदालत ने शादी का झूठा वादा कर दुष्कर्म के आरोप में दर्ज एक एफआईआर को रद्द करते हुए यह टिप्पणी की।

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लंबे समय तक साथ रहने वालों पर झूठे वादे का आरोप नहीं बनता

न्यायमूर्ति संजय करोल और मनोज मिश्रा की खंडपीठ ने कहा:

“यदि दो वयस्क आपसी सहमति से कई वर्षों तक साथ रहते हैं, तो यह मान लिया जाता है कि उनके बीच जो भी संबंध बने, वे समझदारी और सहमति पर आधारित थे। ऐसे में यह तर्क देना कि शादी का झूठा वादा कर शारीरिक संबंध बनाए गए, तर्कसंगत नहीं है।”


हाईकोर्ट का फैसला पलटा

इस मामले में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने आरोपी के खिलाफ मुकदमा चलाए जाने का आदेश दिया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया
शीर्ष अदालत ने माना कि लंबे समय तक लिव-इन में रहने के बाद दुष्कर्म का आरोप लगाना अविश्वसनीय है। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस तरह के मामलों में जांच के दौरान प्राकृतिक न्याय और विवेकशीलता दोनों आवश्यक हैं।


ईडी के अधिकार पर भी उठे सवाल

वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) के अधिकारों पर भी टिप्पणी की।
कोर्ट ने केंद्र सरकार और याचिकाकर्ताओं को निर्देश दिया कि वे उस फैसले के खिलाफ मुद्दों को चिन्हित करें, जिसमें ईडी को गिरफ्तारी और संपत्ति कुर्की का अधिकार दिया गया है।
मामले की अगली सुनवाई 6 अगस्त को होगी और यदि जरूरत पड़ी तो 7 अगस्त को भी सुनवाई जारी रखी जाएगी।


क्या है मामला?

एक महिला ने अपने पुरुष साथी पर यह आरोप लगाया था कि उसने शादी का झूठा वादा करके उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। दोनों कई वर्षों से लिव-इन रिलेशन में थे।
सुप्रीम कोर्ट ने इस आधार पर एफआईआर को निरस्त कर दिया कि लिव-इन में रहने का मतलब है कि दोनों की सहमति पहले से स्पष्ट थी, और किसी “झूठे वादे” की बात तथ्यात्मक रूप से साबित नहीं हो सकती।


फैसले का प्रभाव

यह फैसला लिव-इन रिलेशन में रहने वाले युवाओं के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी मार्गदर्शन प्रदान करता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि सहमतिपूर्ण संबंधों को बाद में आपराधिक रंग देना आसान नहीं होगा, जब तक कि ठोस साक्ष्य प्रस्तुत न किए जाएं।


आप इस फैसले को किस तरह देखते हैं? अपनी राय कमेंट में जरूर साझा करें।

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